भूमिका
समोसा, टिक्की, चिप्स, फ्रेंच फ्राइज़, व्रत का हलवा और घर की आलू-गोभी की सब्ज़ी में आलू हर जगह मौजूद है। पर खेत से थाली तक पहुँचने वाले इस कंद की कहानी उतनी सीधी नहीं है। इसकी जड़ें हज़ारों साल पहले एंडीज़ पर्वतों में हैं। इसकी उपज तापमान, मिट्टी, बीज और खाद के छोटे-छोटे फ़ैसलों पर टिकी है, और हर साल कोई न कोई रोग पूरी फसल को चुनौती दे देता है।
इस लेख में आलू से जुड़ी पूरी जानकारी एक जगह मिलेगी: इतिहास, पोषण, देश की ताज़ा तस्वीर, किस्में, जलवायु, बुवाई, खाद, सिंचाई, रोग-कीट, खुदाई और भंडारण। अंत में एक प्रति एकड़ लागत-तुलना है, जो दिखाती है कि पोषण-प्रबंधन का तरीका बदलने से खर्च और मुनाफ़े में कितना अंतर आ सकता है।
1. आलू की कहानी: एंडीज़ से आपके खेत तक
आलू का संभावित उत्पत्ति-केंद्र दक्षिण अमेरिका के मध्य एंडीज़ क्षेत्र (पेरू और बोलिविया का ऊँचा पठार) में माना जाता है। वहाँ के मूल निवासी इसे सदियों से उगा रहे थे और कंद उनका रोज़ का भोजन था। स्पेनवासियों को यह फसल काम की लगी और वे इसे यूरोप ले गए। 1565 में यह पेरू से स्पेन पहुँचा। माना जाता है कि सर फ्रांसिस ड्रेक इसे 1586 के आसपास इंग्लैंड लाए। इसके बाद इटली, फ्रांस और आयरलैंड की खेती में इसकी जगह पक्की हो गई। आयरलैंड के अकाल के दिनों में यही फसल लोगों का सहारा बनी।
भारत में आलू 17वीं सदी की शुरुआत में आया। माना जाता है कि इसे पुर्तगाली लाए, जो पूर्व की ओर समुद्री व्यापार-मार्ग खोलने वाले पहले यूरोपीय थे। भारत में इसका पहला लिखित उल्लेख 1615 का है, जब अजमेर में आसफ खां ने सर थॉमस रो को भोज दिया था और उसका ब्योरा टैरी ने लिखा। लगभग 1675 में सूरत और कर्नाटक के बगीचों में आलू उगाया जाने लगा था। उत्तरी पहाड़ों में खेती मैदानों से देर से शुरू हुई, पर वहाँ यह जल्दी ही नकदी फसल बन गई। नीलगिरि की पहाड़ियों में इसकी खेती की शुरुआत 1822 में हुई।
2. पोषण, उपयोग और एक ज़रूरी सावधानी
थाली में आलू। भारत में आलू मुख्यतः सब्ज़ी के रूप में खाया जाता है, अकेले भी और दूसरी सब्ज़ियों के साथ भी। इससे चिप्स, हलवा, गुलाब जामुन, रसगुल्ला, मुरब्बा, खीर, गुझिया और बर्फी तक बनती है।
क्या मिलता है इसमें। ताज़े आलू में लगभग तीन-चौथाई से कुछ ज़्यादा हिस्सा पानी है। बाकी में मुख्य रूप से स्टार्च (कार्बोहाइड्रेट), थोड़ा प्रोटीन और बहुत कम वसा होती है। पुराने अध्ययनों के आँकड़े इस प्रकार हैं:
अध्ययन मुख्य आँकड़े
औषधीय उपयोग (Nadkarni, 1927 के अनुसार)। आलू स्कर्वी-रोधी है। यकृत संबंधी अपच के रोगी इसे आसानी से पचा लेते हैं। यह मूत्रवर्धक और दुग्धवर्धक माना गया है। पत्तियों का अर्क पुरानी खाँसी में ऐंठन कम करने के लिए और पिसे आलू का लेप आग से जले स्थान पर लगाने के लिए प्रयोग होता रहा है। आलू का रस साइट्रिक और सक्सिनिक अम्ल के कारण गहरे रंग का होता है। ये पारंपरिक उपयोग हैं, इनका इलाज के रूप में प्रयोग चिकित्सक की सलाह से ही करें।
मीली और नॉन-मीली आलू: मीली आलू वह है जो पकने पर बिखरकर भुरभुरा हो जाता है, क्योंकि उसकी कोशिकाएँ आपस में अलग हो जाती हैं। ऐसे आलू में स्टार्च ज़्यादा होता है और उसका विशिष्ट गुरुत्व (specific gravity) भी ऊँचा होता है। कच्चे यानी अपरिपक्व आलू में स्टार्च कम होने से यह गुण नहीं दिखता। इसीलिए चिप्स और फ्राइज़ के लिए ज़्यादा शुष्क पदार्थ वाली किस्में चुनी जाती हैं।
हरा आलू न खाएँ: धूप या रोशनी में पड़े आलू हरे पड़ जाते हैं और उनमें सोलेनिन नामक विषैला क्षारीय पदार्थ बढ़ जाता है। यह इंसानों और पशुओं दोनों के लिए हानिकारक है, और गंभीर मामलों में जानलेवा भी हो सकता है। छिलका उतारने से इसका बड़ा हिस्सा (लगभग 70%) निकल जाता है, पर हरे, अंकुरित या कड़वे स्वाद वाले आलू को खाने के बजाय अलग कर देना ही ठीक है। कंदों को हमेशा ढककर और अंधेरे में रखें।
3. भारत और दुनिया में आलू: 2026 की तस्वीर
पिछले तीन दशकों में आलू की खेती ने लंबी छलाँग लगाई है। 1995-96 में देश में आलू का उत्पादन लगभग 188 लाख टन और उत्पादकता लगभग 17 टन/हेक्टेयर थी। आज उत्पादन उससे तीन गुना से ज़्यादा है।
ताज़ा आँकड़े (कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के बागवानी उत्पादन अनुमान):
- आलू देश के कुल बागवानी उत्पादन का क़रीब 16% और सब्ज़ी उत्पादन का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा है। उत्पादन में यह प्याज़ और टमाटर, दोनों से आगे है।
- उत्पादकता का राष्ट्रीय औसत लगभग 24-25 टन/हेक्टेयर के आसपास माना जाता है। आलू का क्षेत्रफल लगभग 22 लाख हेक्टेयर के आसपास है। 2024-25 के लिए विभाग ने आलू का अलग क्षेत्रफल प्रकाशित नहीं किया, इसलिए यह अनुमान है।
- उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा उत्पादक है। देश के कुल आलू का लगभग 30-33% यहीं पैदा होता है। इसके बाद पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश आते हैं। ये पाँच राज्य मिलकर देश के 80% से अधिक आलू का उत्पादन करते हैं। पश्चिम बंगाल और गुजरात प्रति हेक्टेयर उपज में आगे रहते हैं।
- उत्तर प्रदेश में आगरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक ज़िला माना जाता है। फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, मैनपुरी, फ़िरोज़ाबाद, अलीगढ़ और हाथरस भी प्रमुख पट्टी में आते हैं।
चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक है। रूस, यूक्रेन, अमेरिका, पोलैंड, जर्मनी, नीदरलैंड और ब्रिटेन भी बड़े उत्पादकों में हैं।
राज्यवार प्रमुख आलू क्षेत्र (नए नामों के साथ):
4. आलू को पहचानिए: वर्गीकरण और वनस्पति विज्ञान
आलू का पहला पालतूकरण पेरू और बोलिविया के एंडीज़ पठार में हुआ। पालतू बनाई गई सात प्रजातियाँ आज भी ऊँचे एंडीज़ इलाकों में उगाई जाती हैं, और वहीं खेती वाले आलू की सबसे ज़्यादा आनुवंशिक विविधता मिलती है (Engel, 1970)।
आलू असल में जड़ नहीं, तना है। ज़मीन के भीतर जाने वाली शाखाएँ (स्टोलन) अपने सिरे पर फूलकर कंद बना लेती हैं। इसी कारण कंद पर आँखें होती हैं, जिनसे नए अंकुर निकलते हैं।
तालिका 1: खेती वाले आलू की प्रजातियाँ
व्यावसायिक आलू मुख्यतः दो प्रजातियों का है:
- S. tuberosum: सबसे आम। तना छोटा और मोटा, पत्तियाँ बड़ी और चौड़ी।
- S. andigenum: कम आम। तना पतला और लंबा, पर्णक छोटे और संकरे, फूल ज़्यादा आते हैं, स्टोलन लंबे होते हैं और कंद अक्सर रंगीन तथा गहरी आँखों वाले होते हैं।
5. किस्में: अपने खेत और बाज़ार के हिसाब से चुनिए
आलू की सही किस्म चुनना आधी खेती जीत लेना है। किसी को चिप्स-उद्योग के लिए कंद चाहिए, किसी को बाज़ार में सफेद चमकदार आलू, और किसी को पाला या पछेती झुलसा से बचाव। नीचे मुख्य कुफरी किस्मों की जानकारी है। ज़्यादातर किस्में केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने विकसित की हैं।
एक बात ध्यान रखें। ऊपर की उपज-क्षमता किस्म की अधिकतम क्षमता है। खेत में असल उपज मिट्टी, मौसम, बीज की गुणवत्ता और प्रबंधन से तय होती है। हाल के वर्षों में CPRI ने चिप्सोना-3, चिप्सोना-4, फ्रायसोना जैसी प्रसंस्करण किस्में भी निकाली हैं। बुवाई से पहले अपने ज़िले के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से पूछ लें कि आपके इलाके के लिए कौन सी किस्म सबसे ठीक है।
6. आलू को कैसा मौसम चाहिए
आलू मूल रूप से ठंडे मौसम की फसल है। जहाँ नमी और उपजाऊ मिट्टी हो, वहाँ यह समुद्र-तल से लेकर बर्फ़ की रेखा तक उग जाती है। भारत के मैदानों में यह सर्दियों की फसल है और उत्तरी पहाड़ों में गर्मी की।
आलू स्वभाव से लंबे दिन का पौधा है, पर मैदानों में इसे कम तापमान और छोटे दिनों वाले मौसम में उगाया जाता है, क्योंकि कंद बनने के समय यही परिस्थितियाँ तेज़ी से कंद-वृद्धि कराती हैं।
- लगभग 20°C का तापमान कंद बनने के लिए अच्छा है। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता है, कंद बनना घटता है।
- लगभग 30°C पर कंद-निर्माण बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। ऊँचे तापमान पर पौधे की साँस लेने की गति बढ़ जाती है और प्रकाश-संश्लेषण से बनी शर्करा कंद में जमा होने के बजाय ख़र्च हो जाती है।
- बढ़वार के दौरान कभी भी ज़्यादा गर्मी पड़े तो पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है और कंद कम बनते हैं।
- धूप वाले दिन और ठंडी रातें फसल के लिए सबसे अच्छी हैं। ठंडी रातें रोगों का फैलाव भी घटाती हैं।
7. कैसी मिट्टी चाहिए
आलू बलुई दोमट, गाद दोमट, दोमट और चिकनी मिट्टी तक में उग सकता है। पर सबसे अच्छी मिट्टी वह है जो भुरभुरी, गहरी, हवादार और जैविक पदार्थ से भरपूर हो। अच्छे जल-निकास वाली बलुई दोमट या मध्यम दोमट मिट्टी सबसे मुफ़ीद रहती है।
हल्की मिट्टी का फ़ायदा है कि उसमें तापमान समान रहता है और खुदाई आसान होती है। मिट्टी की बनावट कंद की क्वालिटी पर सीधा असर डालती है। क्षारीय या लवणीय मिट्टी आलू के लिए ठीक नहीं है। हल्की अम्लीय मिट्टी (pH 5.0 से 6.5) अच्छी रहती है, क्योंकि अम्लीय परिस्थितियाँ स्कैब रोग को बढ़ने नहीं देतीं।
पहाड़ों में: फरवरी के तीसरे सप्ताह से अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक। नीलगिरि में ऊटी के आसपास साल में तीन बार (फरवरी, अप्रैल और सितंबर) बुवाई होती है। महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश के पठारी इलाकों में आलू बरसात और सर्दी, दोनों मौसम में लगाया जाता है। मैसूर पठार में गर्मी की फसल अप्रैल-जून में और सर्दी की अक्टूबर-दिसंबर में बोई जाती है।
बुवाई के दो तरीके:
- मेड़-कुंड (Ridge and Furrow): खेत में मेड़ें बनाकर कंद कुंडों में लगाए जाते हैं। मेड़ की लंबाई खेत के ढलान के हिसाब से रखें। बहुत लंबी मेड़ों में सिंचाई का पानी ठीक से नहीं पहुँचता।
- समतल क्यारी (Flat Bed): खेत को सुविधाजनक लंबाई-चौड़ाई की क्यारियों में बाँटकर उथले कुंड खोले जाते हैं और सही दूरी पर कंद रखकर उन्हीं कुंडों की मिट्टी से ढक दिए जाते हैं। पौधे 10-12 सेमी ऊँचे हो जाएँ तो मिट्टी चढ़ाई जाती है।
बीज हमेशा प्रमाणित और रोगमुक्त लें। कटे आलू लगाने से सॉफ्ट रॉट जैसी बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है।
10. खाद और पोषण: कितना, कब और कैसे
सामान्य सिफारिश
आलू भारी खुराक वाली फसल है। जिन खेतों में जैविक पदार्थ कम है, वहाँ जुताई के समय, बुवाई से लगभग 15 दिन पहले, 250-500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद या कंपोस्ट डालें। मध्यम मिट्टी में प्रति हेक्टेयर लगभग 100-150 किग्रा नाइट्रोजन, 80-100 किग्रा फॉस्फोरस और 80-100 किग्रा पोटाश की ज़रूरत पड़ती है।
- बुवाई के समय: नाइट्रोजन का दो-तिहाई से तीन-चौथाई हिस्सा और फॉस्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा।
- बुवाई के 30-35 दिन बाद (पहली मिट्टी चढ़ाते समय, जब पौधे 25-30 सेमी के हों): बाकी एक-चौथाई से एक-तिहाई नाइट्रोजन, टॉप ड्रेसिंग या पत्तियों पर छिड़काव से।
- सूक्ष्म पोषक तत्व: बोरॉन, जस्ता, तांबा, लोहा, मैंगनीज़, मॉलिब्डेनम आदि का छिड़काव तभी करें जब पौधों में कमी के लक्षण दिखें।
पारंपरिक बनाम नई विधि: प्रति एकड़ चरणवार तुलना
एक चीज़ बहुत कमाल की है: क्षेत्रीय प्रदर्शनों और किसानों के अनुभव के आधार पर तैयार इस तुलना में दिखाया गया है कि नैनो उर्वरक, जैव-उत्पाद और संतुलित पोषण से आलू का खर्च घटता है और उपज बढ़ती है। नीचे हर चरण की लागत अलग-अलग दी गई है।
ध्यान दें: लागत में बीज का मूल्य, कृषि मशीनरी, सिंचाई और मज़दूरी शामिल नहीं है। ये आँकड़े किसानों के अनुभव पर आधारित हैं। खाद की मात्रा मिट्टी की जाँच और किस्म के अनुसार बदलनी चाहिए।
11. निराई-गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना
आलू में चौड़ी और संकरी, दोनों तरह की पत्तियों वाले खरपतवार उगते हैं। ज़्यादातर मामलों में खरपतवारनाशी की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि मिट्टी चढ़ाने से लगभग सारे खरपतवार दब जाते हैं। मेड़ों पर बचे खरपतवार हाथ से उखाड़ लें।
ज़रूरत पड़े तो अंकुरण से पहले पेंडीमेथालिन या मेट्रिब्यूज़िन जैसे पंजीकृत खरपतवारनाशी लेबल की मात्रा में इस्तेमाल किए जाते हैं। छिड़काव के लिए 800-1000 लीटर प्रति हेक्टेयर पानी का घोल बनता है। अंकुरण के बाद छिड़काव में ध्यान रखें कि दवा आलू के पौधों पर न पड़े।
मिट्टी चढ़ाना क्यों ज़रूरी है? कंद ठीक से बनने के लिए हवा, नमी और उचित तापमान चाहिए। मिट्टी चढ़ाने से कंद ढके रहते हैं, हरे नहीं पड़ते और कीड़ों से बचे रहते हैं।
- पौधे 15-22 सेमी के हों तब पहली मिट्टी चढ़ाएँ। आम तौर पर यही समय नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग का भी होता है।
- मेड़ें इतनी ऊँची हों कि सारे कंद पूरी तरह ढक जाएँ।
- ज़रूरत लगे तो पहली चढ़ाई के दो सप्ताह बाद दूसरी बार चढ़ाएँ।
- बड़े क्षेत्र में मोल्डबोर्ड हल या रिजर से काम आसान होता है।
12. पादप वृद्धि नियामक: शोध क्या कहता है
कुछ शोध बताते हैं कि नीचे दिए उपचार कंद की उपज बढ़ाने में मददगार रहे। इन्हें अपने स्तर पर आज़माने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से सलाह लें।
- बीज कंद को भिगोना: सीसीसी (CCC) 500 मि.ग्रा./लीटर (Schedule और Pandita, 1986), सोडियम एस्कॉर्बेट 100 मि.ग्रा./लीटर (Murthy आदि, 1975), साइटोज़ाइम 5% (Pandita और Hooda, 1979; Singh और Kaur, 1981)।
- पत्तियों पर छिड़काव: एथेफॉन 400 मि.ग्रा./लीटर (Murthy और Banerjee, 1978; Pandita और Hooda, 1979; Sekhon और Singh, 1985), सीसीसी 25 मि.ग्रा./लीटर या गार्लिक एसिड 10-100 मि.ग्रा./लीटर (Kumar और Agarwal, 1978)।
- Sidda Reddy (1988) को मिक्सटैलोल 1 या 2 मि.ग्रा./लीटर के छिड़काव से भी उपज में बढ़त मिली।
13. सिंचाई
बुवाई के समय खेत में इतनी नमी ज़रूर हो कि कंद ठीक से अंकुरित हो सकें। नमी कम लगे तो बुवाई से पहले या तुरंत बाद हल्की सिंचाई दें। शुरुआती 30-35 दिन पौधे को पानी कम चाहिए, इसलिए पहली सिंचाई 30-35 दिन के भीतर करनी है। अगर अंकुरण के लिए नमी कम पड़ती दिखे तो पहली सिंचाई जल्दी कर दें। उसके बाद फसल की माँग के मुताबिक सिंचाई करें। आलू में सबसे आम और कारगर तरीका कुंड (furrow) से सिंचाई है।
14. खुदाई, उपज और भंडारण
- खुदाई के बाद: कंदों को कुछ दिन छाया में ढेर करके रखें। इससे छिलका सख़्त हो जाता है और चिपकी मिट्टी झड़ जाती है।
- उपज: अच्छे प्रबंधन में एक हेक्टेयर से 350-450 क्विंटल अच्छी क्वालिटी का बिकाऊ आलू मिल सकता है।
- छँटाई: यह सबसे ज़रूरी काम है। कटे, चोट खाए और कीट-रोग वाले कंद निकाल दें। स्वस्थ कंदों को आकार के अनुसार अलग-अलग ग्रेड में बाँटें। मिले-जुले आकार बाज़ार में दाम गिराते हैं, इसलिए आकार के हिसाब से अलग रखें।
- किसके लिए कौन सा आकार: बहुत बड़े कंदों की चिप्स उद्योग में माँग रहती है। बहुत छोटे कंद भी बिक जाते हैं, इन्हें लोग कुचलकर सब्ज़ी बनाने के लिए ख़रीदते हैं। पर बहुत बड़े और बहुत छोटे, दोनों तरह के कंद बीज के लिए ठीक नहीं होते।
- शीत-भंडार: बीज वाला आलू सामान्यतः 2-4°C और 90-95% आर्द्रता पर रखा जाता है। खाने और बिक्री का आलू कुछ ज़्यादा तापमान पर (लगभग 4-7°C तक) रखा जा सकता है। चिप्स और फ्राइज़ वाले आलू को बहुत ठंड में रखने पर उसमें शर्करा बढ़ जाती है और तलने पर रंग काला पड़ता है, इसलिए उसे 10-12°C पर रखा जाता है। इसलिए भंडारण से पहले तय कर लें कि आलू किस काम में आएगा।
15. आलू के रोग: पहचान और बचाव
आलू की फसल में कई तरह के रोग लगते हैं: कवक, जीवाणु, विषाणु और फाइटोप्लाज़्मा से। सबसे ज़रूरी सिद्धांत यह है कि रोग आने के बाद इलाज महँगा पड़ता है और बचाव सस्ता। प्रमाणित बीज, फसल-चक्र, संतुलित खाद और समय पर निगरानी, ये चार बातें आधे रोग रोक देती हैं।
दवा को लेकर एक ज़रूरी बात। पुराने ग्रंथों में जिन रसायनों का ज़िक्र है, उनमें से कई भारत में प्रतिबंधित या सीमित हो चुके हैं (जैसे पारा-युक्त कवकनाशक, एंडोसल्फान, टेमिक और मोनोक्रोटोफॉस)। इसलिए यहाँ पुराने रसायनों के नाम या मात्राएँ नहीं दी गई हैं। छिड़काव के लिए हमेशा केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB&RC) में पंजीकृत दवा ही लें और लेबल पर लिखी मात्रा और सावधानी का पालन करें। दवा का चुनाव अपने ज़िले के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी की सलाह से करना सबसे सुरक्षित है।
(क) कवक और जीवाणु जनित रोग
अगेती झुलसा (Alternaria solani)
निचली पत्तियों पर गोल छल्लों वाले भूरे धब्बे बनते हैं। कवक मिट्टी और रोगी पौधों के अवशेष में जीवित रहता है, और टमाटर इसका दूसरा पोषी पौधा है। ज़्यादा नमी और कम तापमान में रोग बढ़ता है।
बचाव: फसल-चक्र अपनाएँ, कटाई के बाद बचे अवशेष जला दें, बुवाई के 30-35 दिन बाद से पंजीकृत कवकनाशक का छिड़काव शुरू करें और 10-15 दिन पर दोहराएँ, और सहनशील किस्में जैसे कुफरी नवीन, कुफरी सिंदूरी और कुफरी जीवन लगाएँ।
पछेती झुलसा (Phytophthora infestans)
यह आलू का सबसे ख़तरनाक रोग है। निचली पत्तियों के सिरों या किनारों पर जल-सिक्त धब्बे बनते हैं, जिनके नीचे सफेद रोएँदार कवक दिखता है। बादल और नमी वाले मौसम में यह कुछ ही दिनों में पूरे खेत में फैल सकता है। गंभीर होने पर ऊपर का पूरा भाग सड़ जाता है और रोग कंदों तक पहुँचकर उन्हें भी सड़ा देता है।
बचाव: स्वस्थ प्रमाणित बीज, बादल छाने या रोग के आसार दिखने से पहले ही निवारक छिड़काव, बादल वाले मौसम में 5-6 दिन के छोटे अंतराल पर छिड़काव, पौधे पूरी तरह सूखने पर ही खुदाई, प्रतिरोधी किस्में (जैसे कुफरी नवीन, कुफरी गिरिराज, कुफरी हिमालिनी), और नाइट्रोजन तथा सिंचाई की अति से बचना।
ब्लैक स्कर्फ (Rhizoctonia solani)
प्रभावित पौधे मर जाते हैं, तने पर घाव बनते हैं और कभी-कभी हवा में कंद बन जाते हैं। कंदों पर काले मस्से जैसे पिंड चिपके रहते हैं। यह रोग मिट्टी और कंद, दोनों से फैलता है।
बचाव: प्रमाणित बीज, बीज कंदों का उपचार (बुवाई से पहले और शीत-भंडार में रखने से पहले), 3% बोरिक एसिड के घोल में कंदों को लगभग 30 मिनट डुबोना, और खेत में पंजीकृत मृदा-उपचार।
सामान्य स्कैब (Streptomyces scabies)
कंदों की त्वचा पर खुरदुरे, कॉर्क जैसे दाग बनते हैं। यह मिट्टी में सालों तक और शीत-भंडार में रोगी कंदों पर बना रहता है। कम नमी में बढ़ता है।
बचाव: रोगमुक्त बीज, कंद उथले लगाना, कंद बनते समय मिट्टी में नमी बनाए रखना, गैर-पोषी फसलों (चुकंदर, गाजर आदि) के साथ फसल-चक्र, और मिट्टी की अम्लीयता (pH 5.0-5.3) बनाए रखना।
ब्लैक लेग और सॉफ्ट रॉट (Erwinia spp.)
तने का आधार काला और सिकुड़ा हुआ हो जाता है, पौधे की बढ़वार रुक जाती है, पत्तियों के सिरे लाल पड़ने लगते हैं और शाखाएँ अकड़कर सीधी हो जाती हैं। कंद पनीले होकर सड़ जाते हैं और उनसे बदबू आती है।
बचाव: स्वस्थ बीज, कटे आलू न लगाना, मौसम में बहुत जल्दी या बहुत देर से बुवाई न करना, रोगी पौधे दिखते ही उखाड़कर नष्ट करना, खुदाई-ढुलाई-भंडारण में चोट से बचाना, भंडारण से पहले कंदों को क्लोरीन-युक्त पानी से धोना, और भंडारगृह को हवादार, सूखा और ठंडा रखना।
जीवाणु उकठा या भूरा सड़न (Pseudomonas solanacearum)
पौधे बौने रह जाते हैं और पत्तियाँ काँसे जैसी हो जाती हैं। तना या कंद काटने पर भीतर की नलिकाएँ भूरी दिखती हैं और दबाने पर सफेद रस निकलता है।
बचाव: स्वस्थ बीज, रोगी पौधे नष्ट करना, रोगी खेत का पानी स्वस्थ खेत में न जाने देना, हर बार रोगी कंद काटने के बाद चाकू कीटाणुरहित करना, कम से कम तीन साल तक मक्का, सोयाबीन जैसी गैर-पोषी फसलों के साथ फसल-चक्र, और जैविक खाद का ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग न करना।
चारकोल रॉट (Macrophomina phaseolina)
जड़ें भूरी पड़ती हैं, तने की त्वचा राख जैसी दिखने लगती है और कंद पर काले धब्बे बनते हैं। गर्म और सूखे महीनों में पछेती फसलों में यह रोग ज़्यादा दिखता है। पहाड़ी आलू इससे लगभग मुक्त रहते हैं।
बचाव: रोगमुक्त बीज, जल्दी पकने वाली किस्में (जैसे कुफरी अलंकार, कुफरी चंद्रमुखी), नियमित सिंचाई और भंडारण से पहले कंदों का पंजीकृत उपचार।
वार्ट या मस्सा रोग (Synchytrium endobioticum)
तनों, स्टोलनों और कंदों पर मस्से जैसे उभार निकलते हैं, जड़ें प्रभावित नहीं होतीं। एक बार खेत में बैठ जाए तो इस पर क़ाबू पाना बहुत मुश्किल है।
बचाव: जिस मिट्टी में रोग पाया गया हो वहाँ आलू न उगाना, रोगमुक्त बीज और सहनशील किस्में (कुफरी शेरपा, कुफरी ज्योति, कुफरी जीवन, कुफरी मुथु)।
(ख) विषाणु रोग
पर्ण-मरोड़ (Leaf Roll): पौधे बौने और सामान्य से ज़्यादा सीधे हो जाते हैं। पत्तियाँ, ख़ासकर नीचे की, मुड़ी हुई, मोटी और चमड़े जैसी हो जाती हैं। रोग संक्रमित कंदों और माहू (Myzus persicae) से फैलता है।
मोज़ेक रोग: मुख्य रूप से तीन प्रकार का:
विषाणु रोगों से बचाव: केवल प्रमाणित बीज लगाएँ। रोगी पौधों को जड़ और मातृ-कंद सहित उखाड़कर नष्ट करें। माहू को नियंत्रित रखें, क्योंकि वही मुख्य वाहक है। उत्तर भारत में जनवरी के पहले सप्ताह के आसपास जब माहू की संख्या तेज़ी से बढ़ती है, तब बीज वाली फसल में पौधों का ऊपरी भाग (हॉल्म) काट दें। इससे विषाणु का कंदों में जाना रुकता है।
(ग) फाइटोप्लाज़्मा रोग
ये सूक्ष्म जीव जैसे रोगजनक फुदकों (लीफ हॉपर) और रोगी कंदों से फैलते हैं।
- डायन झाड़ू (Witches' Broom): पौधे में बहुत-सी पतली शाखाएँ निकलकर झाड़ू जैसी दिखती हैं और छोटे रंगीन कंद बनते हैं, जो खेत में ही अंकुरित हो जाते हैं। यह रोग टमाटर, बैंगन जैसे पौधों में भी जा सकता है। 50°C के गर्म पानी में 10 मिनट कंद उपचारित करने से रोगजनक कमज़ोर पड़ता है।
- पर्पल टॉप: ऊपर की नई पत्तियाँ बैंगनी हो जाती हैं और मुड़ जाती हैं। पौधा बौना रहता है और हवा में छोटे कंद बन जाते हैं। रोगी कंद भी संक्रमण फैलाते हैं। रोगी पौधे उखाड़ें और फुदकों पर क़ाबू रखें।
- सीमांत पीलापन (Marginal Flavescence): ऊपरी पत्तियों के किनारे पीले पड़ते हैं, पत्तियाँ छोटी और संकरी रह जाती हैं और कंद छोटे गुच्छों में बनते हैं, जिनमें जल्दी अंकुर निकलते हैं।
- आलू फिलोडी: पत्तियाँ और तने बहुत रोएँदार हो जाते हैं, फूल असामान्य रूप से बड़े और प्यालेनुमा बन जाते हैं। संक्रमित कंदों को 50°C के गर्म पानी में 10-15 मिनट रखने से रोगजनक ख़त्म किया जा सकता है।
16. आलू के कीट
कटवर्म (कट कीड़ा): रात में निकलकर अंकुरों को ज़मीन के पास से काट देता है, कंदों में छेद भी करता है, जिससे बाज़ार भाव गिरता है। बचाव: अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद ही डालें और जहाँ नुकसान दिखे, वहाँ पंजीकृत कीटनाशक से उपचार करें।
एपिलैकना बीटल: इसके प्रौढ़ और लार्वा दोनों पत्तियों को जालीनुमा कर देते हैं। बचाव: अंडे, लार्वा और प्रौढ़ हाथ से चुनकर नष्ट करें, ज़रूरत हो तो पंजीकृत कीटनाशक का छिड़काव करें।
पत्ती खाने वाली सूँडियाँ (Spilosoma obliqua, Spodoptera exigua): पत्तियाँ खाकर नुकसान पहुँचाती हैं। बचाव: समय पर निगरानी और पंजीकृत कीटनाशक। खेत के चारों ओर सीमा-उपचार भी काम करता है।
माहू (एफिड, Myzus persicae): पत्तियों का रस चूसता है। पत्तियाँ पीली पड़कर नीचे को मुड़ जाती हैं। माहू शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ छोड़ता है, जिस पर काली फफूँद बैठ जाती है। सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि यह विषाणु रोग फैलाता है। बचाव: बुवाई के समय पंजीकृत दानेदार कीटनाशक, 10-12 दिन के अंतर पर निगरानी, और जनवरी के पहले सप्ताह में हॉल्म काटना (बीज वाली फसल में)।
जैसिड (फुदका): पतला, हरा, पच्चर जैसा कीट जो पत्तियों के नीचे से रस चूसता है। पत्तियाँ पीली पड़कर मुड़ जाती हैं और बाद में जली हुई लगती हैं, जिसे "हॉपर बर्न" कहते हैं।
आलू कंद-पतंगा (Phthorimaea operculella): भंडारण का मुख्य कीट है, पर खेत में भी हमला कर सकता है। कंदों में सुरंग बना देता है। बचाव: स्वस्थ बीज बोएँ, अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद डालें, मिट्टी सावधानी से इस तरह चढ़ाएँ कि कंद खुले न रहें (वरना मादा पतंगा अंडे दे देती है), भंडारण से पहले गोदाम को साफ़ और कीटाणुरहित करें और प्रभावित कंद छाँटकर अलग करें।
गोल्डन निमेटोड (Globodera rostochiensis): इसे आलू का सिस्ट निमेटोड भी कहते हैं। संक्रमित पौधों में मिट्टी की सतह के पास अतिरिक्त जड़ें निकलती हैं और बाहरी पत्तियाँ समय से पहले पीली पड़कर सूख जाती हैं। बचाव: संक्रमित क्षेत्र को अलग (क्वारंटीन) रखें, वहाँ टमाटर-बैंगन जैसी सोलेनेसी फसलें न लगाएँ, फसल-चक्र में दूसरी फसलें लें, और संक्रमित इलाके से बीज कंद या मिट्टी न लाएँ। कुफरी स्वर्णा इसके प्रति प्रतिरोधी है।
जड़-गाँठ निमेटोड (Meloidogyne incognita, M. javanica): पौधे बौने और रोगी दिखते हैं, अचानक सूख भी सकते हैं, और कंदों पर छोटी गाँठें बनती हैं। निमेटोड अंड-समूहों के रूप में रोगी जड़ों और कंदों के साथ मिट्टी में बचे रहते हैं। इसका प्रबंधन भी टमाटर जैसा ही है: फसल-चक्र, गर्मी में गहरी जुताई और स्वस्थ बीज।
निष्कर्ष
आलू की खेती को जो किसान बीज, मौसम, मिट्टी, खाद और रोग-प्रबंधन को एक साथ जोड़कर देखता है, वही इसे सचमुच फ़ायदे की फसल बना पाता है। प्रमाणित बीज से शुरुआत, सही किस्म और समय पर बुवाई, मिट्टी की जाँच पर आधारित संतुलित खाद, रोगों की पहले से तैयारी और खुदाई के बाद सही भंडारण, ये कड़ियाँ जुड़ती हैं तो लागत घटती है और मुनाफ़ा बढ़ता है। भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक है, और इस फसल में अभी बहुत गुंजाइश बाकी है, खासकर उत्पादकता, प्रसंस्करण और निर्यात में।
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